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 "वाल्मीकि की जीवन कथा और उनके अस्तित्व के स्रोत: वाल्मीकि की कहानी का खोज"

                   

 "वाल्मीकि महर्षि: एक महान संत और लेखक"


 वन्दे प्राचेतसं नित्यं वाल्मीकिं मुनिपुंगवम् । 

निर्ममे रामकाव्यं यः सीतायाश्चरितं महत् ॥

 पात्रीभूय स्वयं तत्र गर्भाङ्कुर ररक्ष सः । 

रामान्वयस्य सीतायां महात्मा समुदारधीः ॥ 

तपःस्वाध्यायनिरतो धर्मनिष्ठः शुचिव्रतः । 

रम्यं रामायणं कृत्वा यशो लेभे सनातनम् ॥ 


महर्षि वाल्मीकि लौकिक संस्कृत साहित्य के आदिकवि हैं और उनके द्वारा प्रणीत रामायण संस्कृत का आदिकाव्य माना जाता है । आर्ष ( ऋषिप्रणीत ) महाकाव्यों में रामायण की गणना प्रथम स्थानीय है । महर्षि वाल्मीकि उन विश्वकवियों में अग्रणी हैं , जिनकी कविता एक देश - विशेष के ही मनुष्यों का मंगल - विधान नहीं करती और न ही किसी कालविशेष के प्राणियों का मनोरंजन करती है । रामायण सार्वदेशिक और सर्वकालिक है । वह चिरपुराण है और चिरनूतन भी । रामायण एक धर्मशास्त्र है , महाकाव्य है और एक इतिहासग्रन्थ भी है । ऐसे पवित्र और महनीय ग्रन्थ के प्रणेता महर्षि वाल्मीकि के भौतिक परिचय से हम प्रायः अनभिज्ञ हैं । हमें उनके स्थितिकाल का ज्ञानमात्र इतना ही है कि वे त्रेतायुगमें अवस्थित थे और भगवान् रामके समकालिक थे । 


Valmiki Jayanti 2022- कौन थे वाल्मीकि, डाकू से महर्षि बनने की कथा , कैसे हुई रामायण की रचना

कौन थे वाल्मीकि -

 वाल्मीकि जी ने संस्कृत रामायण की रचना की तथा संसार इन्हे आदिकवि के रूप से जानती है। हिन्दू शास्त्र और धर्मग्रंथों में  रामायण को एक महाकाव्य भी कहा गया है। जो श्रीराम के जीवन से हमें सत्य,  कर्तव्य  और करुणा का संदेश देती है। कहा जाता है कि रामायण की रचना वाल्मीकि जी ने राम जन्म से पहले ही कर दी थी।  वैदिक जगत में सर्वप्रथम काव्य  कहलाने वाली रामायण में कुल 24000 श्लोक 100 आख्यान , 500 सर्ग तथा 7 कांडों की रचना है। रामायण के रूप में श्री राम की भक्ति करने के साथ महर्षि वाल्मीकि ने सीता को अपने आश्रम में आश्रय दिया तथा लव कुश को गुरु बन कर शिक्षा भी दी। 


वाल्मीकि जी का जन्म -

वैदिक पुराण के अनुसार इनका जन्म ब्रह्मा के कुल में हुआ। आश्वािन मास की  शरद पूर्णिमा के दिन जन्मे वाल्मीकि के माता पिता महर्षि कश्यप और अदिति के नवे पुत्र वरुण और उनकी पत्नी चर्षणी थे।  एक और कथा के अनुसार कहा जाता है,  इन्हें एक निसंतान भील दंपत्ति ने चुराया और इनका  पालन पोषण एक भील  प्रजाति में हुआ। उस परिवार के साथ रहते-रहते उन्होंने काफी वक्त जंगल में गुजारा और डाकू रत्नाकर के नाम से जाने जाते थे। आम राहगीरों को लूट कर उनकी संपत्ति को चुराकर वो अपने परिवार का पालन करते थे। 

        कोशों में इनकी गोत्रसंज्ञा ' प्राचेतस ' कही गयी है । ज पुराण भी इसका समर्थन करते हैं । ' प्रचेता ' वरुण को कहते हैं । 


डाकू से वाल्मीकि बनने की कथा -

महर्षि वाल्मीकि के आरम्भिक जीवन के सम्बन्ध में एक किंवदन्ती बहुत प्रसिद्ध है । ये वनप्रान्त में निवास करनेवाले एक लुटेरे थे । यात्रियों को लूटकर जो धन प्राप्त करते थे , उसीसे अपने परिवार का भरण - पोषण करते थे । उनका नाम ' रत्नाकर ' कहा जाता है । एक दिन क्रूर रत्नाकर ने कुछ संन्यासियों को लूटने की नीयत से पकड़ा । संन्यासियों ने कहा - ' अरे भले आदमी , हमारे पास तो कोई धन - दौलत नहीं है , किंतु यह बताओ कि जिस पापकर्म के द्वारा तुम अपने परिवार का पोषण करते तुम्हारे इस पाप के भागी होंगे ? ' 

     रत्नाकर ने कहा कि यह तो मुझे नहीं मालूम । तुम लोग रुको , मैं अपने परिवार से पूछकर बताता हूँ । ऐसा कहकर और उन लोगों को बाँधकर ( कि कहीं वे लोग भाग न जायँ ) वे अपने परिवार से उस प्रश्न का उत्तर पूछने चले गये । परिवारवालों ने कहा कि हमारे पालन का दायित्व आप पर है । आप इसे कैसे करते हैं— इससे हमें कोई मतलब नहीं । आपके द्वारा किये गये पाप या पुण्य से हमें कुछ भी लेना - देना नहीं है । पाप का भागी हम क्यों बनें ? रत्नाकर की आँखें खुल गयीं । वह भागा - भागा उन संन्यासियों के पास आया और उनके एक बन्धन खोलकर पैरों में गिर पड़ा , आर्तस्वर में बोला ' मेरा उद्धार कीजिये । मैंने बहुत पाप किये हैं । ' संन्यासियों ने उसे करुणापूर्वक उठाया और उपदेश वह दिया- ' राम - राम जपो । ' किंतु हीनवृत्ति का होने के कारण वह ' राम - राम का उच्चारण न कर सका । तब उन्होंने उसे ' मरा - मरा ' कहने का उपदेश दिया । यह उच्चारण के उसके लिये सहज था । उसने निरन्तर ' मरा - मरा ' का उच्चारण आरम्भ किया , निरन्तर गति से उच्चारण करने में  ' मरा ' , ' राम ' ही हो जाता है । गोस्वामी तुलसीदास ने इसी ओर संकेत किया है। 


उलटा नामु जपत जगु जाना । बालमीकि भए ब्रह्म समाना ॥ 

संन्यासीगण उपदेश देकर चले गये और इधर वह लुटेरा रत्नाकर परिवार का माया - मोह छोड़कर , एक आसन से बैठकर ' मरा - मरा ' अर्थात् ' राम - राम' का निरन्तर जप करते हुए एकाग्रचित्तता के कारण समाधिस्थ हो गया । उसे जडवत् पृथ्वी पर बैठे हुए पाकर दीमकों ने अपनी बाँबी की मिट्टी से ढँक दिया । सिद्ध होकर समाधि से उठने पर उसने अपने को दीमकों द्वारा मिट्टी से ढँका हुआ पाया । फिर तो वही महर्षि वाल्मीकि के नाम से प्रसिद्ध हुआ ( वाल्मीकि का अर्थ होता है दीमकों की बाँबी या मिट्टी का ढेर ) । 

    महर्षि वाल्मीकि  ब्राह्मण - कुलोत्पन्न थे। युवावस्था में कुसंगति में पड़ जाने से बर्बर लुटेरे हो गये थे ,  किन्तु सत्संगति और तपस्या के प्रभाव से ये एक सिद्ध महात्मा हो गये और महर्षि वाल्मीकि के नामसे प्रसिद्ध हुए। 

रामायण की रचना -

महर्षि वाल्मीकि आदि महाकाव्य ' रामायण' के प्रणेता हैं । इसके साथ ही वे रामकथा के एक विशिष्ट और महनीय पात्र भी हैं । रामायण के अध्येता इस रामकथा में आदि से अन्त तक महर्षि वाल्मीकि की  उपस्थिति का अनुभव करते हैं और यथावसर महर्षि वाल्मीकि अपनी सक्रिय भूमिका भी निभाते हैं ।  

  शुद्ध अन्तःकरण वाले सिद्ध महर्षि वाल्मीकि आश्रम बनाकर शिष्यों सहित भगवती भागीरथी ( गंगा ) - से नातिदूर तमसा नदी के तटपर निवास करते थे । एक दिन देवर्षि नारद भ्रमण करते हुए उनके आश्रम पर पधारे । महर्षि वाल्मीकि ने देवर्षि का यथाविधि पूजन सत्कार किया । फिर दैव - प्रेरणा से उनके मन में एक जिज्ञासा उत्पन्न हुई और उन तपस्वी वाल्मीकि ने लोक और शास्त्र में पारंगत विद्वद्वरेण्य देवर्षि नारदसे से  पूछा - ' भगवन् ! इस समय संसार में गुणवान् , वीर्यवान् , धर्मज्ञ , कृतज्ञ , सत्यवादी और दृढ़संकल्प वाला कौन है ? वह कौन पुरुष है , जो सदाचार परायण , सभी व जीवों का हितसाधक , विद्वान् , सामर्थ्यशाली और एकमात्र प्रियदर्शन अर्थात् सर्वसुन्दर है ? मन को वश में रखनेवाला , क्रोध को जीतनेवाला , कान्तिमान् , किसी की भी निन्दा न करनेवाला - वह कौन है ? युद्ध में कुपित होनेपर देवता भी जिससे डरते हैं ? हे महामुने ! ऐसे ( इन गुणों से युक्त) व्यक्ति को जानने के लिये मेरे मन में  तीव्र अभिलाषा है । आप ऐसे पुरुष को अवश्य  जानते होंगे (क्योंकि आप सर्वज्ञ हैं ) । अतः मुझे बतलाने की कृपा करें । " 

महर्षि वाल्मीकिके इस वचन ( प्रश्न ) को सुनकर त्रिलोक देवर्षि नारद ने कहा कि है महर्ष । आपने जिन दुर्लभ गुणों से युक्त पुरुष को जानने की अभिलाषा व्यक्त की है , वे इक्ष्वाकुवंश मै उत्पन्न पुरुष हैं , जो राम के नाम से  लोकविख्यात हैं । तत्पश्चात् देवर्षि नारद ने महर्षि वाल्मीकि के सम्मुख श्रीराम के पावन चरित्र और चरित का विस्तारपूर्वक वर्णन किया । ऐसे महापुरुष के सम्बन्ध में जानकर महर्षि वाल्मीकि बहुत प्रसन्न हुए । देवर्षि नारद ने उन्हें श्रीराम का पूरा जीवन - चरित ही सुना डाला । महर्षि वाल्मीकि ने देवर्षि नारद का अपने शिष्यों सहित श्रद्धापूर्वक पूजन किया । 


       उसी दिन कुछ समय पश्चात् महर्षि वाल्मीकि अपने दैनन्दिन क्रम में स्नान के लिये पवित्र तमसा नदी के तटपर गये , जो उनके आश्रम के समीप ही था । उनके साथ भरद्वाज नामक शिष्य थे । तमसा का निर्मल जल और स्वच्छ तट देखकर महर्षि ने शिष्य भरद्वाज से वल्कल वस्त्र ले लिये तथा प्रान्तवर्ती वन की शोभा का अवलोकन करते हुए स्नानार्थ जल में प्रवेश करनेवाले ही थे कि उन्होंने वहाँ क्रीडारत क्रौंचपक्षी का एक जोड़ा देखा । उसी समय एक व्याधने निशाना साधकर उसमें से एक पक्षी का वध कर दिया , जिससे शोकार्त क्राँची करुण-कंद्रण  करने लगी । यह कारुणिक दृश्य देखकर महर्षि का हृदय द्रवित हो उठा और उनके मुख से उस  व्याध के लिये शाप भरे ये शब्द सहसा ही फूट पड़े'-  

                         मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः । 

                        यत्क्रौञ्चमिथुनादेकमवधीः   काममोहितम् ॥








अर्थात् , रे व्याध ! तुझे आगे आनेवाले नित्य निरन्तर दिनों ( वर्षों ) -में कभी शान्ति न मिले , क्योंकि तूने क्रौंच के इस जोड़े में से काम मोहित एक पक्षी का अकारण वध कर दिया ( वह तो निरपराध था ) , वह अदण्ड्य था । 

अपने मुख से निकले वाक्य के सम्बन्ध में तत्काल ही ध्यान आने पर वे सोचने लगे कि ' अरे , इस पक्षी के शोक से पीड़ित होकर मैंने यह क्या कह डाला ! ' ऐसा विचार करते हुए महर्षि वाल्मीकि के मन में एक निश्चय हुआ और उन्होंने वहाँ अपने शिष्य भरद्वाज से कहा ' वत्स , शोक से पीड़ित हुए मेरे मुख से जो वाक्य निकल  पड़ा है , वह चार चरणों में आबद्ध है । इसे वीणा के लयपर गाया भी जा सकता है , अतः मेरा यह वचन श्लोकरूप होना चाहिये । ' गुरु के मुख से यह सुनकर समर्थन करते हुए शिष्य मुनि भरद्वाज बोले - ' हाँ , आपका यह वाक्य निश्चय ही श्लोकरूपता को प्राप्त करता है । ' 

      स्नान करके महर्षि वाल्मीकि आश्रममें आये थे कि ।  सृष्टि के निर्माता चतुर्मुख ब्रह्मा जी वहाँ पधारे । वाल्मीकि  उन्हें देखते ही  उनके सम्मुख हाथ जोड़कर खड़े हो गये । तत्पश्चात् पाद्य , अर्घ्य , आसन प्रदान करके स्तुति पूर्वक उनकी सपर्या की तथा उनके चरणों में प्रणाम किया । भगवान् ब्रह्मा स्वयं आसन पर बैठे और महर्षि को बैठने के लिये कहा । यह सब करते हुए भी महर्षि वाल्मीकि के चित्त में क्रौंच पक्षी वाली दुर्घटना और उनके मुँह से सहसा निकला हुआ वह शाप ही घूम रहा था । ब्रह्माजी उनकी मनःस्थिति को जानकर बोले - ' ब्रह्मन् ! तुम्हारा वह वचन छन्दोबद्ध श्लोक ही है । तुम्हारे माध्यम से यह छन्दोमयी वाणी का नवावतार है । ऐसा मेरी प्रेरणा से ही सम्भव हुआ है । तुमने देवर्षि नारद के मुख से जिन श्रीराम का चरित सुना है , उनका वर्णन इसी छन्दोमयी वाणी में करो । ऐसा करते हुए तुम्हें मेरे प्रभाव से श्रीराम के लोकपावन गुप्तचरित भी प्रकट हो जायँगे । इस काव्य में अंकित कोई भी बात झूठी नहीं होगी । तुम्हारे द्वारा कही गयी यह रामकथा लोक में सदा अक्षुण्ण रहेगी । तुम्हारी यह रामायण ' आदिकाव्य ' कही जायगी और तुम भी ' आदिकवि ' कहे जाओगे । ' ऐसा कहकर ब्रह्माजी अन्तर्धान हो गये और महर्षि वाल्मीकिने रामायण का प्रणयन किया ।

रामकथा के प्रणयन के माध्यम से महर्षि वाल्मीकि ने मानवजाति पर अनन्त उपकार किया है । आश्विनमास की पूर्णिमा - तिथि को उनकी जयन्ती पर हम उन आदिकवि का श्रद्धापूर्वक पावन स्मारण करते हैं ।


   


महर्षि वाल्मीकि के हमें क्या सिखाते है -

वाल्मीकि जी के जीवन से सीखने को मिलता है की अगर ज्ञान के अभाव में चाहे हमसे गलती हो जाये लेकिन ज्ञान होते ही हमें अपना मार्ग बदल देना चाहिए। असत्य से सत्य के मार्ग पर चल कर और तप के बल पर सारे बुरे कर्म उस अँधेरे की तरह मिट जाते है जो सूरज के आने पर रौशनी में बदल जाते है। रामायण में किये गए सूर्य , चन्द्रमा तथा नक्षत्रों की सटीक गणना से ये भी पता चलता है की वे खगोल विद्या और ज्योतिष विद्या के भी जानकर थे।  




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